अतिक्रान्तिकारी

मेरी एक अतिक्रान्तिकारी से मुलाकात हो गई। एक बेचारा मामूली क्रान्तिकारी होता है, जो क्षेत्र में काम करता है। भूखा रहता है। सूखी रोटी और प्याज झोले में लेकर चलता है, पिटता है, जेल जाता है। यह मामूली क्रान्तिकारी है। एक अतिक्रान्तिकारी होता है, विशिष्ट। यह दिन में दाड़ी ‘ट्रिम’ कराता है, कॉफी हाउस में बैठकर कॉफी पीता है, बिटर कॉफी। क्रान्ति एक कड़वी चीज है। कॉफी में शक्कर डली हुई आई हो, तो चम्मच से उसे निकालकर टेबिलपर डाल देता है, जिस पर मक्खियाँ भिनकती हैं । सिगरेट के कुन्दे को ऐशट्रे में नहीं, कॉफी के कप में डालता है। सिगरेट को ऐसे क्रोध में मरोड़कर बुझाता है, जैसे बुर्जुआ का गला घोंट रहा हो। दिन में एक क्रान्तिकारी मार्क्स, लेनिन, माओ के जुमले याद करता है। रात को दोस्तों के साथ शराब पीता है और क्रान्तिकारी जुमले दोहराता है। फिर मुर्गा इस तरह खाता है, जैसे पूँजीवाद को चीथ रहा हो । मेरी जिस क्रान्तिकारी से भेंट हुई, यह दूसरे प्रकार का विशिष्ट था। दाड़ी बड़ी मेहनत से सजाई हुई थी। बढ़िया कुर्ता, पाजामा ।  झोला भी उत्तम । सुनहरे फ्रेम का चश्मा । क्रान्तिकारी के स्थानीय साथी ने परिचय दिया,  ‘सी.पी.आई. (एम.एल.) के उत्तरप्रदेश के सेक्रेटरी हैं।’ मैंने पूछा, एम.एल. के तो कई गुट हैं। एक से ज्यादा लाइनें हैं ।  आप किस गुट के हैं – सत्येन्द्र नारायण सिंह के या खोकेन मजुमदार ? या नेगी के साथ हैं ? लिन पियाओ लाइन अभी भी मानते हैं या डेंग सियाओ पिंग की कोई नई लाइन है? सी.पी.आई. (एम.एल.) का एक गुट तो सी.आई.ए. ने भी बना रखा है। क्रान्ति का इतना बड़ा कारोबार हो रहा है और उसमें सी.आई.ए. का शेयर न लगा हो, तो यह असम्भव है । सवाल और रिमार्क मैंने एक साथ नहीं कर डाले।  बातचीत में आते गए ।  उनका कहना था कि उनकी पार्टी इन सबसे अलग है । यह जितने गुट सी.पी.आई. (एम.एल.) के हैं, सब भ्रष्ट विचारधारा रखते हैं। फिर उन्होंने वह मुहावरे मुख से निकाले और वह वक्तव्य दिए जिनसे हम लोग अच्छी तरह से परिचित है . सामाजिक साम्राज्यवादी रूस और अमरीकी साम्राज्यवादी में साठगाँठ है। दोनों मिलकर बाकी दुनिया पर कब्जा कर रहे हैं। इनमें अन्तर्विरोध को बढ़ाएंगे । अफगानिस्तान के मामले में यही अन्तर्विरोध प्रकट हो रहे हैं। सामाजिक साम्राज्यवादी रूस अफगानिस्तान पर कब्जा करना चाहता है। हम अमरीका की मदद से इसका विरोध कर रहे हैं। रूसी साम्राज्यवादी पहला दुश्मन है – एनिमी नम्बर वन ! फिदेल कास्त्रो उधर रूसी साम्राज्यवादी का एजेण्ट है। इधर वियतनाम का फामवान डांग एजेण्ट है । अच्छा, ये बातें भी एक साथ नहीं हुईं, होती गईं । क्रान्तिकारी ने कृषिशास्त्र में एम.एस.सी. तीन चार साल पहले कर लिया था। पिता लोककर्म विभाग में अफसर थे । रिटायर हो गए हैं । उनके पास डेढ़ सौ एकड़ जमीन है। युवा क्रान्तिकारी फॉर्म चलाते हैं। मैंने पूछा कॉमरेड, आपके फॉर्म पर खेत मजदूर तो होंगे । उन्हें मिनिमम वेज (न्यूनतम मजदूरी) आप क्या देते है? मुझे पता नहीं । हिसाब पिताजी देखते हैं । कॉमरेड, खेत मजदूरों से काम आप लेते हैं और मजदूरी पिता पर छोड़ देते हैं। आपके पिता न्यूनतम वेतन नहीं देते होंगे, यह पक्का है और आप अपने पिता से न्यूनतम मजदूरी दिलाते नहीं हैं, तो माक्र्सवादलेनिनवाद के हिसाब से क्रान्ति के लिए हमेशा दूसरे के बाप की तलाश करनी चाहिए। अपने बाप को खून चूसने की सुविधा दी जाती है क्रान्ति में। उस खून का एक हिस्सा क्रान्तिकारी बेटा भी पीकर सर्वहारा का नेतृत्व करने बन जाता है। यह अतिक्रान्तिकारी अपनी पार्टी के संगठन या प्रचार के काम से नहीं आए थे। कई साल पहले अमरीकी सहयोग से खुले कृषि विश्वविद्यालय की मार्फत अमरीका में ‘फेलोशिप’ प्राप्त करने की कोशिश के लिए आए थे। क्रान्तिकारी की यह नस्ल नई नहीं है, पहले भी थी। अब बढ़ गई है। कई सालों से देख रहा हूँ। अच्छी नौकरी लगने पर घूस खिलाकर पुलिस रिपोर्ट ठीक कराता है। अच्छा धन्धा जमने पर मार्क्सवाद की जगह दो नम्बरी दर्शन का अध्ययन करता है। जवानी में जैसे अच्छे कपड़े, अच्छे जूते, अच्छी टाई का शौक होता है, वैसे ही सम्पन्न घरों के कुछ युवकों को क्रान्ति का शौक हो जाता है। क्रान्तिकारिता को वे एक और अच्छा सूट, और एक और अच्छी टाई, एक और अच्छा जूता समझते हैं। इससे शोभा ब़ती है। प्रतिष्ठा बढ़ती है। क्रान्तिकारिता नया फैशन हैं। कुछ दिन से क्रान्तिकारी ‘हीरो’ बन कर उछलकूद करते हैं। मैं कुछ क्रान्तिकारियों को जानता हूँ जिनकी बाकी जिन्दगी इस प्रचार को ढोने में गुजरती है कि वे कम्युनिस्ट थे। क्रान्तिकारिता, जिसे उन्होंने कभी द्वार पर रंगोली की तरह सजाया था, अब पाँवों में काँटे की तरह चुभती है। उसे वे नष्ट कर देना चाहते हैं। वे अखबारों में समय समय पर बयान छपाते हैं कि यह ‘दुष्टप्रचार’ है कि मैं कम्युनिस्ट हूँ । मैं कभी भी कम्युनिस्ट नहीं था। ऐसा वे नौकरी में सुरक्षा और तरक्की के लिए करते हैं ।एक विश्वविद्यालय है, जिसके बारे में प्रचार है कि वहाँ वामपन्थी भरे हैं। वहाँ खूब आन्दोलन होते हैं। कहते हैं, वहाँ उग्रवामपन्थी भी बहुत हैं। खूब पोस्टर लगते हैं। प्रचार साहित्य बँटता है। बहसें होती हैं। मैंने एक वरिष्ठ अध्यापक से कहा, ‘आपका विश्वविद्यालय तो वामपन्थ का गढ़ है। वामपन्थी दलों को बहुत काडर मिलता होगा आपके यहाँ से।’’ उन्होंने कहा, ‘हाँ, सी.पी.आई., सी.पी.आई. (एम.) के भी बहुत हैं । अतिउग्रवादी वामपन्थी भी हैं । पर वामपन्थी दलों को बहुत कम कार्यकर्ता मिलते हैं। अधिकांश लड़के उच्चवर्ग के हैं, खाते पीते घरों के। वामपन्थी कहलाने वाला यह विश्वविद्यालय वास्तव में सम्पन्नों का है। बढ़िया खाते हैं, पीते हैं, पहनते हैं, बहुत अय्याशी है। सारे मनोरंजन हैं। क्रान्तिकारिता एक और स्कॉच की बोतल है। इनमें जो खास क्रान्तिकारी होते हैं, वे फेलोशिप लेकर अमरीका चले जाते हैं या किसी मल्टी नेशनल में। वामपन्थी रूप धारण करके क्रान्तिकारिता का नाटक करने से इन युवकों की कीमत बढती है बाज़ार में । वे अपने खरीददार को जानते हैं । उसे माल की ‘क्वालिटी’ दिखाते हैं। क्रान्तिकारिता के पानी में जो मछली ज्यादा उछलती और उतरती है, उसे अमरीकी बगुला उतनी ही फुर्ती से पकड़ता है। काशीनाथ सिंह की एक बहुत अच्छी कहानी है ऐसे झूठे क्रान्तिकारी पर। क्रान्तिकारी कॉमरेड साथियों में बैठकर गुरिल्ला युद्ध की योजनाएँ बनाते हैं। फिदेल कास्त्री, चे गुवेरा, माओ, ही ची मिन्ह का नाम जपते हैं। कॉमरेड की शादी कर दी जाती हैं और वे कर लेते हैं। कार में अपनी दुल्हन को लेकर आ रहे हैं, सोच में क्रान्तिकारी ही रहे हैं। नारी उनके लिए अर्थहीन है। उन्होंने क्रान्ति का वरण किया है। रास्तें में पहाड़ी मिलती है। वे कहते हैं…गुरिल्ला युद्ध के लिए यह बढ़िया जगह है । कार को झटका लगता है । उनकी पत्नी सहारे के लिए कन्धे पर हाथ रख देती है। क्रान्तिकारी हाथ अलग करके कहते हैं…यह कन्धा बन्दूक के लिए है, स्त्री का हाथ रखने के लिए नहीं। आगे क्रान्तिकारी अपने चोर सामन्तवादी ससुर से अपने राजनैतिक प्रभाव का उपयोग करके छोटे भाई को नौकरी दिलवाते हैं। बहन की ससुराल से भी लाभ लेते हैं,  समझौते रखते हैं। फायदे उठाते हैं । हूँहूँ करते हैं । मगर क्रान्ति के तेवर कायम रखे हैं। एक बार बहन की ससुराल गए। वह भी सामन्ती परिवार है। वहाँ कोई उनसे यह कह देता है कि छोटे मालिक भी क्रान्तिकारी हैं। रात को आँगन में वह और उनकी बहन का देवर सो रहे हैं। क्रान्तिकारी उस युवा से क्रान्ति की बातें कर रहे हैं। वर्ग युद्ध की योजना पर चर्चा कर रहे हैं। गोरिल्ला युद्ध की रणनीति तय कर रहे हैं बहुत रात हो जाती है, तो वह लड़का खींझकर कहता है भाई साहब, अब ज्यादा ‘बोर’ मत कीजिए । आप भी सोएँ और मुझे भी सोने दीजिए। कॉमरेड, अपने देश के बारे में भी तो कुछ सोचते होंगे? देश के बारे में क्या सोचना है? भारतीय एकाधिकार पूँजीपतियों और रूसी साम्राज्यवादियों ने मिलकर इन्दिरा कांग्रेस की सरकार बनवा दी है।  इस सरकार को हथियारबन्द संघर्ष में गिराना है । आर्म्ड क्लास वार! यह अकालराहत कार्य क्या है? इन्दिरा गांधी की इमेज बनाकर उसका शिकंजा मजबूत करने के लिए है। ज्योति बसु भी राहत कार्य खोलकर प्रतिक्रान्तिकारियों का साथ दे रहा है । तो कॉमरेड, जो लोग प्यासे मर रहे हैं, उन्हें पानी पिलाने से क्या क्रान्ति पीछे हटती है? तो प्याऊ बन्द कर देने से क्रान्ति नजदीक आ जाएगी? लोग भूख प्यास से मर जाएँगे, तो क्या ठीक होगा? रेवोल्यूशन करना है तो आदमी के मरने की क्या चिन्ता? तो कॉमरेड, अगर पाँच लाख आदमी गन्दा पानी पी कर हैजे से मर जाएँ तो क्या क्रान्ति हो जाएगी? क्या दस्त की बीमारी से भी क्रान्ति होती है?

By

हरिशंकर परसाई
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