पता नहीं यह रुलाई कैसी-सी है

मैं लिखित कविता की किसी तरह आती जाती साँस हूँ

उदास हूँ

मैं साहित्य से बाहर की बदहवासी हूँ मैं हवा को हेलो कहता पेंटागन का नहीं बच्चों का बनाया काग़ज़ का हेलीकॉप्टर हूँ अन्धड़ हूँ मैं ईश्वर के न होने के उल्लास में सोता हुआ बेफिकरा लद्धड़ हूँ।

चकबन्दी, नसबन्दी और नोटबन्दी
के गलियारों से गुज़रता मैं खुले जेल का बन्दी

मैं ढूँढ़ रहा हूं चन्दूबोर्डे की अपने समय की सबसे निर्भीकता से छक्के के लिए उड़ाई लाल गेंद की मर्फी रेडियो से छनकर आती मासूमियत।

इस बदहवासी में मैं कौन सी फ़िल्म देखने जाऊँ सिनेमा थियेटर स्टाक मार्केट में बदल गए हैं क्रिकेट कैसिनो में।

मैं कितने ही चैनलों में ढूंढ़ता रहा सईद अख़्तर मिर्ज़ा की कोई फ़िल्म लेकिन बार-बार गुजरात के गिर फॉरेस्ट में हिरण को दौड़ाता व्याघ्र मिलता रहा और गुजरात दंगों का छुट्टा अभियुक्त और बुलेट ट्रेन के सपनों में मदमाता देशभक्त और अमिताभ बच्चन का गुजरात आने का आमन्त्रण लेकिन उनके बुलाने के पहले ही मैं तो गुलबर्ग सोसायटी हो आया था
और रो आया था
पता नहीं यह रुलाई
वैसी ही थी या नहीं कि जैसी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रोए होंगे बनारसी और बनिया नवजागरण की शैली में कि
भारत दुर्दशा देखी न जाई।

मतलब कि पर्यटन में आप पर यह मुमानियत तो हो नहीं सकती कि आप क्या न देखें

और इतिहास के किस दौर की किस शैली में

किस कोने में किस अन्धेरे में किस उजाले के लिये रोएँ।

कोई मेरे कान में कहता है कि कारपोरेट हमारे भ्रष्ट ऐस्थेटिक्स में निवेश करता है और हमारी राजनीतिक मनुष्यता से डरता है। वह कोई कौन है कि जैसे सरकारी अस्पताल के कोने में बजती हुई खाँसी
और लक्ष्मीबाई के गिरने के बाद रौंदी हुई झाँसी।
एक तरफ पूरे देश की हाय है
जिसके बरक्स प्लास्टिक चबाती बाल्टी भर राजनीतिक और अमूल दूध देती गाय है

और स्मृति के तुलसीत्व की रामदेवीय दन्तकान्तीय महक। दहक।……………ता है दिल।
निर्वासित है तो कहीं भी मिल।

नवाज़ुद्दीन को उनके अपने ही नगर में शिवसैनिकों ने मारीचि तक नहीं बनने दिया राम बनने की ललक उन्होंने दिखाई होती तो क्या होता कहा नहीं जा सकता

मैं रामलीला में कुछ नहीं बनूँगा

मैं भारतीय नागरिक के पात्र की भूमिका से ही हलकान हूँ मुक्तिबोध की तरह सबको नंगा देखता और उसकी सज़ा पाता कंगले बनारसी बुनकर की कबीरी थकान हूँ

नरोदा में एक के बाद दूसरा जलाया गया मकान हूँ कह लीजिये अपने को कोसता हिन्दुदुस्तान हूँ।

ईश्वर को धोखा देने की रणनीति से मैं काफी विह्वल हूँ
इतना संशयालु हूँ कि सम्भल हूँ और इतना म्लान हूँ कि धूमिल हूँ।
समकालीन साम्यवाद किसी सुखवाद का नमूना है

होगा कोई विस्मृत आत्म-निर्वासित जिसे वैचारिक निमोनिया है

अगर देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया ही जाना था तो ठीक उसके पहले अखलाक की हत्या के अभियुक्त की मृत देह को तिरंगे में लपेटकर बर्फ़ में रखा गया।

जेल में वह चिकिनगुनिया से मरा या अपराधबोध से यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट में निकलने से रहा फिर भी काबीना स्तर का मन्त्री पूरे लाव लश्कर, राजनीतिक कार्यभार और सांस्कृतिक ज्वर के साथ पहुँचा। अफ़सोस यह कि आत्म सम्मान और साम्प्रदायिकता के सात्विक क्रोध से काँपते हिन्दुओँ से यह वादा न कर सका कि जन्मजात अब कोई शूद्र न होगा।

हिन्दू सत्य इस समय लगभग हरेक की जेब में है स्मार्ट फ़ोनों के ऐप में है श्रीराम सेना वालों के पास पड़े-पड़े वह इतना कोसा हो गया है कि तीन साल पुराना मीथेनमय समोसा हो गया है उत्तर-सत्य की इस महावेला में।

अब तो काफ़ी लोगों का मानना है कि जाति पर अगर सोच समझकर राजनीतिक नीरवता में सर्जिकल स्ट्राइक की जाए तो वह ख़त्म हो सकती है लेकिन फिर इसके लिए कम से कम एक कैबिनेट मीटिंग तो बनती है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में आज़ादी का नारा सबसे सांगीतिक तरीके से लगाने वाले कन्हैया ने हमारे पराभव के कुछ दिनों को आशावाद में बदल दिया
लेकिन काहे यार, लालू का पैर छू लिया
फिर भी धन्यवाद एक डेढ़ पखवाड़े की झनझनाती टँगटड़ाँग उम्मीद के लिए।

लालू हमारे अंत:करण के लिए ज़रूरी पदार्थमयता है।
सेक्युलरिज्म के लिए यह अच्छी ख़बर है कि हम सब भूल गए हैं कि लालूपोषित शहाबुद्दीन पूर्व जेएनएयू अध्यक्ष चन्द्रशेखर का हत्यारा था मतलब कि लालू हमारे सेक्युलरीय गणित के लिए अनिवार्य अंक है

एक गल्प है कि हमारे पास विकल्प है।

आइये एक सवाल पूछते हैं मोदी से नहीं ख़ुद से
कि राष्ट्र के तौर पर हम कौन हैं —
यह द्विवेदी बताएँगे जो चैनलों में घूमता वैचारिक डॉन हैं
एक खूँ आलूदा पर्दे के सामने स्तब्ध बैठे हम स्साले निस्सार निरीह माशा छटाँक आधा और पौन हैं।

मेरे पास क्या है एक बेजुबान आँ है
सामने ढहता जग है ठग है अपमान भूलने के लिए मेरे झोले में पंजाब से लाई ड्रग है
और काव्यगुणों में न लिथड़ता रेटरिक
और लाल सलाम वाला कटा हुआ हाथ
और जो आदिवासी मार दिया गया खाते समय
उसका न खाया भात

~ देवी प्रसाद मिश्र

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देशहित

मैं देश से बहुत प्रेम करता हूं
-कितना प्रेम करते हो
-बहुत ज्यादा
– कितना ज्यादा
– बहुत बहुत बहुत ज्यादा
– यह तो बड़ी अच्छी बात है। ये बताओ कि तुम देश से प्रेम कैसे करते हो
– कैसे का मतलब
– मतलब किस तरह
– क्या मतलब ?
– देखो, मां बच्चे को प्यार करती है तो उसे चूमती है, सहलाती है और गले से लगा लेती है…..तुम देश से किस तरह प्रेम करते हो?
– माँ के प्रेम से बहुत बड़ा है मेरा देश प्रेम
– पर करते कैसे हो?
– ये …तो…. कल बताऊँगा।

असगर वजाहत की लघु कथा

A Wednesday

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कॉमन मैन और अब इनफैक्ट, आप लोग मेरा ये काम पूरा करेंगे,आज अभी
कमिसनर:- सॉरी ,मै कुछ समझा नहीं . .
कॉमन मैन :- आपके घर में कॉकरोच आता है तो आप क्या करते है राठौर साहब , आप उसको पालते नहीं मरते है . ये चारो कॉकरोच मेरा घर गन्दा कर रहे थे , और आज मै आपने घर साफ़ करना चाहता हूँ I

कमिसनर:- तुम ,तुम हो कौन ??

कॉमन मैन :- मै वो हूँ जो आज बस और ट्रैन में चढ़ने से डरता है , मै वो हूँ जो काम पे जाता है तो उसकी बीवी को लगता है की जंग पर जा रहा है , पता नहीं लौटेगा या नहीं , हर दो घंटे बाद फ़ोन करती है की चाय पी की नहीं ?
खाना खाया की नहीं ?
दरअसल वो ये जानना चाहती है की मै जिन्दा हु या नहीं I
मै वो हु जो कभी बरसात में फास्ट है ,कभी
ब्लास्ट में . मै वो हु जो कभी किसी के हाथ में तस्बीर देखकर शक करता है I
और मै वो भी हूँ जो आजकल दाढ़ी बढ़ाने
और टोपी पहनने से घबराता है , बिज़नेस के लिए दुकान खरीदता है तो सोचता है की नाम क्या रखूं .. कंही दंगे में मेरा नाम देखकर मेरी दूकान ना जला दे I
झगड़ा किसी का भी हो बेवजह मरता मै ही हूँ ..
भीड़ तो देखि होगी ना आपने , भीड़ में से कोई एक शक्ल चुन लीजिये ,
मै वो हूँ I

I Am Just A Stupid Comman Man , Wanting To Clean His House.

कमिसनर: आज अचानक ये स्टुपिड कॉमन मैन कैसे जग गया , वो भी छे किलो RDX के साथ ..

कॉमन मैन :- क्यों , जग गया तो तकलीफ हो रही है ?? जिंदगी भर घुट – घुट के मरते रहना चाहिए था मुझे .. और ये अचानक नहीं हुआ है राठौर साहब , यु कहिये की टाइम नहीं मिला , रोजी – रोटी के चक्कर में ये काम जरा नेग्लेक्ट हो गया , लेकिन देर आये दुरस्त आये .. वो बाकी का एक कॉकरोच भी आज ही मरेगा ..

कमिसनर: लेकिन ये चार ही क्यों ?? और भी तो है ..
कॉमन मैन :- मैंने लाटरी निकाली इन चारो का नाम आया ..
कमिसनर: तुम ये कह रहे हो की , अगर हमने इस एक इब्राहिम को नहीं मारा , तो ना जाने कितने बेगुनाहो को तुम मार दोगे
कॉमन मैन :- अरे , वे लोग तो वैसे भी मरेंगे , राठौर साहब , आज नहीं तो कल और , इब्राहिम खान जैसे ही लोग मरेंगे उन्हें . पिछली बार ट्रैन में मारा इस बार कंही और मरेंगे , और तब तक मारते रहेंगे जब तक हम इन्हे जवाब देना नहीं सीखेंगे ..
कमिसनर: तुम हो क्या ??
कॉमन मैन :- मतलब ??
कमिसनर: हिन्दू हो मुस्लमान हो , क्या हो ??
कॉमन मैन :- मेरे मजहब का इससे कुछ लेना देना नहीं हे ..
कमिसनर: लेना देना हे ..
कॉमन मैन :- मेने कहा ना

I Am Just The Stupid Common Man
कमिसनर: स्टुपिड कॉमन मैन

कॉमन मैन :- राइट
कमिसनर: तुम्हे दर लग रहा है पकडे जाने का , मारे जाने का ..
कॉमन मैन :- शायद
कमिसनर: Be Specific, हां या ना . .
कॉमन मैन :- हां
कमिसनर: तो फिर ये डर याद रखना , और ये मत सोचना की तुम आम आदमी का झंडा दिखाकर बच जाओगे , तुम जो साबित कर रहे हो ना वो ..
कॉमन मैन :- मै साबित कुछ नहीं कर रहा हूँ , राठौर साहब मै सिर्फ आपको याद दिलाना चाहता हूँ की लोगो मै गुस्सा बहुत है उन्हें आज़माना बंद कजिये . We are Resiliant By Force Not By Choice. आपको बेबस करने में मुझे सिर्फ चार हफ्ते लगे . आपको क्या लगता है की जो लोग हमें मारते है वो हमसे ज्यादा इंटेलीजेंट है I अरे इंटरनेट पर बम टाइप करके
सर्च मारिये तीन सौ बावन साइट्स मिलेंगे , की बम कैसे बनाया जाता है , क्या – क्या इक्विपमेंट इस्तमाल होता , सारा इनफार्मेशन आसानी से एक्सेस होता है मुफ्त में I आप जानते है की कपडे धोने का साबुन तक एक पोटेंशियल बम होता है , मुझे लगता है के कॉमन मैन के लिए इससे ज्यादा useful प्रोडक्ट आज तक नहीं बना. गलती हमारी है हम लोग बहोत जल्दी Used to हो जाते है , एक ऐसा हादसा होता है तो चैनल बदल – बदल कर सारा माजरा देख लिया SMS किया फ़ोन किया , शुक्र मनाया की हम लोग बच गए और हम उस सिचुएशन से लड़ने की बजाय हम उसके साथ एडजस्ट करना शुरू कर देते है I पर हमारी भी मज़बूरी है ना , हमे घर चलना होता है साहब , इसलिए हम सरकार चुनते है की वो मुल्क चलाये . आप लोग , सरकार , पुलिस फाॅर्स , इंटेलिजेंस सक्षम है इस तरह के पेस्ट कण्ट्रोल के लिए , लेकिन आप लोग कर नहीं रहे है , सिर्फ शह दिए जा रहे है ..
Why Are You Not Nipping Them In The Bud ??

एक आदमी गुनहगार है या नहीं
इसको साबित करने मै आपको दस साल लग जाते हैं , आपको ये नहीं लगता है की ये आपकी क़ाबलियत पर सावल है , ये सारा नाटक बंद होना चाहिए , This Hole *** System Is Fraud. आप जैसे लोग इन कीड़ो का सफाया नहीं करेंगे तो हमें झाड़ू उठानी होगी , लेकिन क्या है उससे हमारी Civilized Society का बैलेंस बिगड़ जायेगा , लेकिन क्या करे , राठौर साहब मुझे यकीं है की जो ट्रैन ब्लास्ट हुए वो सिर्फ एक टेररिस्ट एक्टीवि नहीं थी , वो एक बहोत बड़ा सावल था , और वो सवाल ये था की भाई हम तो तुम्हे इसी तरह मरेंगे , तुम क्या कर लोगे ??
Yes, They asked UsThis Question On A Friday, Repited It On Tuseday And I Am Just Replaying On Wednesday.
कमिसनर: तुम्हारी ये होम मेड ऐड साल्ट टूथपेस्ट वाली फलसफा गलत है ये सही तरीका नहीं है I

Shah: हां जनता हूँ ..लेकिन आज मै तरीके के बारे में नहीं नतीजे के बारे में सोच रहा हूँ .
कमिसनर: तुम्हारा कोई जान – पहचान वाला मारा था इस ब्लास्ट में ??
कॉमन मैन :- क्यों . मुझे उस दिन का इंतज़ार करना चाहिए जब मेरा कोई अपना बेवजह इस तरह की जलील मौत मरे तब आपको मेरा ये कदम जायज मालूम होगा …….हां जानना ही नै तो सुनिए , मेरा अपना कोई था उस ट्रैन में ….बिस – इक्कीस साल का था .. नाम नहीं जनता हूँ मै उसका , रोज़ मिलता था फर्स्ट क्लास में ..फाटक पे लटके , मुस्कुरा के , हाथ हिला के हेलो कहता था , मै भी जवाब में उसको हेलो कहता था .. ऐसे बहोत सारे लोग थे एक – दूसरे को नाम से नहीं जानते थे पर सिर्फ हेलो से जानते थे .. हादसे से एक रोज़ पहले उसने मुस्कुरा के मुझे अपनी इंगेजमेंट रिंग दिखाई थी , He Was Very Happy.. अगले रोज़ मेरी ट्रैन मिस हो गयी मैं बच गया ,पर वो नहीं बचा .. उसके बाद में ट्रैन में गया तो मेरी जान – पहचान का कोई नहीं था सब नए चेहरे थे ..
कमिसनर: तो ये सब तुम उन चेहरों के लिए कर रहे हो ..
कॉमन मैन :- नहीं , नहीं , नहीं .. मै इतना भी इमोशनल या सेंटीमेंटल नहीं हूँ . I Always knew, What Loss Is ??
अपनों को मरते हुए देखा है मैंने .. लेकिन साहब ये अक्सेप्टबल नहीं है .. की कोई ……. बटन दबाकर ये फैसला करे की मुझे कब मरना है

तुम्हें आपत्ति है ~ निर्मला पुतुल

तुम कहते हो
मेरी सोच ग़लत है
चीज़ों और मुद्दों को
देखने का नज़रिया ठीक नहीं है मेरा

आपत्ति है तुम्हें
मेरे विरोध जताने के तरीके पर
तुम्हारा मानना है कि
इतनी ऊँची आवाज़ में बोलना
हम स्त्रियों को शोभा नहीं देता

धारणा है तुम्हारी कि
स्त्री होने की अपनी एक मर्यादा होती है
अपनी एक सीमा होती है स्त्रियों की
सहनशक्ति होनी चाहिए उसमें
मीठा बोलना चाहिए
लाख कडुवाहट के बावजूद

पर यह कैसे संभव है कि
हम तुम्हारे बने बनाए फ्रेम में जड़ जाएँ
ढल जाएँ मनमाफिक तुम्हारे सांचे में

कैसे संभव है कि
तुम्हारी तरह ही सोचें सब कुछ
देखें तुम्हारी ही नज़र से दुनिया
और उसके कारोबार को

तुम्हारी तरह ही बोलें
तुम्हारे बीच रहते ।
कैसे संभव है ?

मैंने तो चाहा था साथ चलना
मिल बैठकर साथ तुम्हारे
सोचना चाहती थी कुछ
करना चाहती थी कुछ नया
गढ़ना चाहती थी बस्ती का नया मानचित्र
एक योजना बनाना चाहती थी
जो योजना की तरह नहीं होती
पर अफ़सोस !
तुम मेरे साथ बैठकर
बस्ती के बारे में कम
और मेरे बारे में ज़्यादा सोचते रहे

बस्ती का मानचित्र गढ़ने की बजाय
गढ़ते रहे अपने भीतर मेरी तस्वीर
और बनाते रहे मुझ तक पहुँचने की योजनाएँ
हँसने की बात पर
जब हँसते खुलकर साथ तुम्हारे
तुम उसका ग़लत मतलब निकालते
बुनते रहे रात-रात भर सपने

और अपने आसपास के मुद्दे पर
लिखने की बजाय लिखते रहे मुझे रिझाने बाज़ारू शायरी
हम जब भी तुमसे देश-दुनिया पर
शिद्दत से बतियाना चाहे
तुम जल्दी से जल्दी नितांत निजी बातों की तरफ़
मोड़ देते रहे बातों का रुख
मुझे याद है!

मुझे याद है-
जब मैं तल्लीन होती किसी
योजना का प्रारूप बनाने में
या फिर तैयार करने में बस्ती का नक्शा
तुम्हारे भीतर बैठा आदमी
मेरे तन के भूगोल का अध्ययन करने लग जाता ।

अब तुम्हीं बताओ !
ऐसे में भला कैसे तुम्हारे संग-साथ बैठकर हँसू-बोलूँ ?
कैसे मिल-जुलकर
कुछ करने के बारे में सोचूँ?

भला, कैसे तुम्हारे बारे में अच्छा सोचकर
मीठा बतियाऊँ तुमसे?
करूँ कैसे नहीं विरोध
विरोध की पूरी गुंजाईश के बावजूद?

कैसे धीरे से रखूँ वह बात
जो धीरे रखने की मांग नहीं करती !

क्यू माँ के गर्भ से ही ऐसा पैदा हुई मैं ?

बुखार, ब्रेक अप, आइ लव यू ~ शुभम श्री

104 डिग्री
अब पुलिस मुझे आइ० पी० सी० लगाकर गिरफ़्तार कर ले
तो भी नहीं कहूँगी कि मैंने तुमसे प्रेम किया है
प्रेम नहीं किया यार
प्रेम के लायक लिटरेचर नहीं पढ़ा
देखो, बात बस ये है कि..
..कि तुम्हारे बिना रहा नहीं जा सकता ।
कहो तो स्टाम्प पेपर पे लिख के दे दूँ
नहीं.. नहीं..नहीं..

मैंने तुम्हारे दिमाग़ का दही बनाया है
लड़ाई की है, तंग किया है ?
हाँ, किया है
तो लड़ लो
(वैसे तुमने भी लड़ाई की है पर अभी मैं वो याद नहीं दिला रही)
तुम भी तंग कर लो
ब्रेक-अप क्यों कर रहे हो ?
ये मानव अधिकारों का कितना बड़ा उल्लंघन है
कि
आधे घण्टे तक फ्रेंच किस करने के बाद तुम बोलो –
हम ब्रेक-अप कर रहे हैं !
102 डिग्री
अफ़सोस कि मैं कुछ नहीं कर सकती
तुम्हारा ‘नहीं’ चाहना
इस ‘नहीं’ को हाँ कैसे करूँ, कैसे ?
प्लीज बोलो ना
‘नहीं’ दुनिया का सबसे कमीना शब्द है
उससे भी ज्यादा है ‘ब्रेक-अप’

अब एक प्यारे से लड़के की याद में
होमर बनने का क्या उपाय है दोस्तों ?
चाहती हूँ वो लिखूँ..वो लिखूँ.. कि
आसमान रोए और धरती का सीना छलनी हो
पानी में आग लगे, तूफ़ान आए
पर रोती भी मैं ही हूँ, सीना भी मेरा ही छलनी होता है
आग-तूफ़ान सब मेरे ही भीतर है
बाहर सब बिन्दास नॉर्मल रहता है
काश पता होता
प्यार कर के तकलीफ़ होती है
काश
(हज़ारों सालों से कहते आ रहे हैं लोग लेकिन अपन ने भाव कहाँ दिया.. देना चाहिए था )
99 डिग्री
तुम्हें याद है जब एग्जाम्स के वक़्त मुझे ज़ुकाम हुआ था
कैसे स्टीम दिला-दिला कर तुमने पेपर देने भेजा था
और बारिश में भीग कर बुखार हुआ था
तो कितना डाँटा था
अब भी बुखार आता है मुझे
आँसू भी आने लगे हैं आजकल साथ में

कितनी आदतें बदलनी पड़ेंगी
ख़ुद को ही बदल देना पड़ेगा शायद
जैसे कि अब बेफ़िक्र नहीं रहा जा सकता
ख़ुश नहीं हुआ जा सकता कभी
और
सेक्स भी तो नहीं किया जा सकता

वो सारी किसेज जो पानी पीने और सूसू करने जितनी ज़रूरी थीं ज़िन्दगी में
किसी सपने की मानिन्द ग़ायब हो गई हैं..
ओह कितनी यादें हैं, फ़िल्म है पूरी
कभी ख़त्म न होने वाली
मेरी सब फ़ालतू बातें जिनसे मम्मी तक इरिटेट हो जाती थी
तुम्हीं तो थे जो सुन कर मुस्कुराया करते थे
और तुम, जिसकी सब आदतें मेरे पापा से मिलती थीं
और वो मैसेज याद हैं
हज़ारों एस० एम० एस०.. मैसेज-बॉक्स भरते ही डिलीट होते गए
उन्हें भरोसा था कि ख़ुद डिलीट होकर भी
उन्होंने एक रिश्ते को ‘सेव’ किया है
दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता..
तुम चिढ़ जाओगे कि ये सब लिखने की बातें नहीं हैं
क्यों नहीं हैं ?
तुम्हारे प्यारे होठों से भी ज़्यादा प्यारे डिम्पल
और उनसे भी प्यारी मुस्कुराहट की याद
मुझे सेक्स की इच्छा से कहीं ज़्यादा बेचैन करती है
तुम्हारे शरीर की ख़ुशबू जिसके सहारे हमेशा गहरी नींद सोया जा सकता है
वही तुम, जिसे निहारते हुए लगता है –
काश इसे मैंने पैदा किया होता..
ज़िन्दा रहने की चन्द बुनियादी शर्तें ही तो हैं न
हवा, पानी, खाना और तुम
तुम..
101 डिग्री
मैं उन तमाम लड़कियों से
जो प्यार में तकिए भिगोती हैं और बेहोश होती हैं
माफ़ी माँगना चाहती हूँ
वो सभी लोग जो बी० पी० एल० सूची के राशन की तरह
फ़ोन रीचार्ज होने का इन्तज़ार करते हैं
जो ऑक्सीजन की बजाय सिगरेट से साँस लेते हैं
वोदका के समन्दर में तैरते हैं
हमेशा दुखी रहते हैं
उन पर ली गई सारी चुटकियाँ, तंज, ताने, मज़ाक
मैं वापस लेती हूँ
104 डिग्री
और तुम
तुम तो कभी ख़ुश नहीं रहोगे
रिलेशनशिप..अण्डरस्टैण्डिंग.. ईगो.. स्पेस..
नहीं जानती थी मैग्जीन्स से बाहर भी
इन शब्दों की एक दुनिया है

तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं क़बूल करती हूँ
हाँ, मुझमें हज़ारों कमियां हैं
मैंने तुम्हें जंगलियों की तरह प्यार किया है
कि तुम्हें गले लगाने के पहले
फ़्लैट की किस्त और इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं जोड़ी
अपना साइकोएनालिसिस नहीं किया
हाँ, मुझे नहीं समझ आता ‘ब्रेक-अप’ का मतलब
नहीं आता !
तुम्हें गुस्सा आता है तो आए
लेकिन
आइ लव यू
जितनी बार तुम्हारा ब्रेक-अप, उतनी बार मेरा आइ लव यू..

बियाबान… सरेराह ~देवी प्रसाद मिश्र

मरना ठीक होता है या नहीं लेकिन मरना पड़ता है कि जैसे शराब पीनी ठीक है या नहीं
लेकिन पीनी पड़ती है प्रेम करना पड़ता है
और कविता लिखनी पड़ती है।

जिस कवि के बारे में कहा जा रहा है कि वह मर गया
और जिन बन्द आँखों के बारे में पता नहीं क्या-क्या सियापा किया जा रहा है
उसमें अमर्त्य रहने की गहरी शरारत है।
देह कितनी जल्दी बर्बाद और खत्म हो जाती है
इच्छाएँ बरसों बाद भी 19 वें जन्मदिन की
तारीखें बनी रहती हैं।
मृत्यु की भी मुक्ति नहीं उसे पुरानी प्रेमिकाओं के टॉप्स पहनकर
मण्डराना पड़ता है कवि की अमरता के हठ के इर्द-गिर्द।

क्रान्तियाँ कविताओं में उत्पाद करती रहती हैं
लेकिन बस का टिकट और नौकरी की तनख्वाहें पूंजीवाद के टिकटघरों और दफ्तरों से
मिलती है और कौन फुटपाथ पर रहेगा और कौन मकान में और
किस मकान में
और कौन-कौन अस्पताल में भर्ती होगा और किस
ये नियम फासीवादी बनाते हैं या अपराधी या सट्टेबाज़ या सामन्त
या माफ़िया जो अमूमन जनप्रतिनिधि भी होते हैं।
बलाओं का पता नहीं कि उन्हें पूंजीवाद ने बनाया या मार्क्सवाद ने
लेकिन वे कविताओं पर कब्ज़ा कर लेती हैं
और उसे सत्रह साल की छोकरी की तरह भटकाती रहती हैं
जिसे न राह मिलती है
न मकान।

कविता तमाम तरह के रसायनों और मोहब्बत और खून में लिथड़ती रहती है
और पता नहीं कि वर्जनाओं के नियम तोड़ती है और
कहीं भी भाग जाने के लिए उतावली रहती है
कहीं भी आग लगा देती है किसी पर भी गोली चला देती है
और पता नहीं कहाँ-कहाँ जली मिलती है
नीली और स्याह और रुआंसी और बियाबान में
सरे राह हाथ देती रहती है
बस, उसे वह खड़-खड़ करता ट्रक दिख भर जाए
जिसके पीछे लिखा हो स्वतन्त्रता।

यातना देने के काम आती है देह ~देवी प्रसाद मिश्र

देह प्रेम के काम आती है.
वह यातना देने और सहने के काम आती है.
देह है तो राज्य और धर्म को दंड देने में सुविधा होती है
पीटने में जला देने में
आत्मा को तबाह करने के लिए कई बार
देह को अधीन बनाया जाता है
बाज़ार भी करता है यह काम
वह देह को इतना सजा देता है कि
उसे सामान बना देता है
बहुत दुःख की तुलना में
बहुत सुख से खत्म होती है आत्मा